Sharad Purnima Vrat Katha: हिंदू धर्म में शरद पूर्णिमा अत्यंत पवित्र तिथि मानी जाती है। इसे कोजागरी पूर्णिमा, रास पूर्णिमा और कौमुदी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस रात मां महालक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और अपने भक्तों की भक्ति, श्रद्धा तथा जागरण से प्रसन्न होकर उन्हें सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं। इसी कारण शरद पूर्णिमा की रात मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु की पूजा की जाती है, चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है और खीर का भोग लगाया जाता है।
शरद पूर्णिमा के दिन मां लक्ष्मी की पूजा के साथ मुख्य रूप से दो कथाएं सुनाई जाती हैं। पहली कथा साहूकार की दो बेटियों और पूर्णिमा व्रत की महिमा से जुड़ी है। दूसरी कथा ब्राह्मण वलित की है, जो कोजागरी व्रत और मां लक्ष्मी की कृपा का वर्णन करती है। नीचे दोनों कथाएं विस्तार से दी गई हैं, ताकि आप पूजा के समय श्रद्धापूर्वक उनका पाठ कर सकें।
शरद पूर्णिमा व्रत कथा: साहूकार की दो बेटियों की कहानी
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय की बात है। किसी नगर में एक धनी साहूकार रहता था। उसके परिवार में धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी। साहूकार की दो बेटियां थीं। दोनों बेटियां स्वभाव से अच्छी थीं, लेकिन धार्मिक कार्यों और व्रत-उपवास के प्रति उनकी श्रद्धा में अंतर था। दोनों बहनें प्रत्येक पूर्णिमा को व्रत रखती थीं। बड़ी बहन व्रत को पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ करती थी। वह सुबह स्नान करके भगवान का स्मरण करती, दिनभर व्रत के नियमों का पालन करती और शाम को चंद्रमा के दर्शन करके अर्घ्य देने के बाद ही व्रत खोलती थी। वह मानती थी कि व्रत केवल भूखे रहने का नाम नहीं है, बल्कि मन को पवित्र रखने, भगवान के प्रति विश्वास बनाए रखने और अपने संकल्प को पूरा करने का माध्यम है।
इसके विपरीत, छोटी बहन भी व्रत तो रखती थी, लेकिन वह नियमों का पूरी तरह पालन नहीं करती थी। कभी वह समय से पहले भोजन कर लेती, तो कभी पूजा और चंद्रमा को अर्घ्य दिए बिना ही व्रत खोल देती थी। बड़ी बहन उसे समझाती थी कि यदि व्रत का संकल्प लिया है, तो उसे श्रद्धा और नियमपूर्वक पूरा करना चाहिए, लेकिन छोटी बहन उसकी बातों को गंभीरता से नहीं लेती थी। वह सोचती थी कि व्रत रखने से ही उसका फल मिल जाएगा, चाहे नियमों का पालन पूरा हो या नहीं। समय बीतता गया। जब दोनों बहनें विवाह योग्य हुईं, तो साहूकार ने उनका विवाह अच्छे परिवारों में कर दिया। विवाह के बाद दोनों अपने-अपने घरों में रहने लगीं।
बड़ी बहन को मिली संतान सुख की प्राप्ति
बड़ी बहन अपने ससुराल में भी पूर्णिमा का व्रत पूरी श्रद्धा के साथ करती रही। वह मां लक्ष्मी का स्मरण करती, भगवान विष्णु की पूजा करती और जरूरतमंद लोगों की सहायता करती थी। कुछ समय बाद उसके घर संतान का जन्म हुआ। उसके बच्चे स्वस्थ और प्रसन्न रहने लगे। परिवार में खुशियां छा गईं। सभी लोग इसे ईश्वर की कृपा और उसके धार्मिक जीवन का शुभ फल मानते थे। बड़ी बहन के मन में कभी अहंकार नहीं आया। वह अपनी सुख-समृद्धि के लिए भगवान और मां लक्ष्मी के प्रति आभार व्यक्त करती रही।
छोटी बहन के जीवन में आया दुख
दूसरी ओर, छोटी बहन के जीवन में कठिनाइयां आने लगीं। उसे संतान सुख प्राप्त नहीं हो रहा था। वह मन ही मन दुखी रहती और सोचती कि उसने भी तो अपनी बड़ी बहन की तरह पूर्णिमा का व्रत रखा था, फिर उसके जीवन में ऐसा अंतर क्यों है? कुछ समय बाद उसे भी संतान प्राप्त हुई, लेकिन लोकप्रचलित कथा के अनुसार उसकी संतान जीवित नहीं रह पाती थी। जब भी उसके घर बच्चे का जन्म होता, कुछ समय बाद उसकी मृत्यु हो जाती। इस घटना से छोटी बहन और उसका पति बहुत दुखी रहने लगे। घर में खुशियां आने से पहले ही मातम छा जाता था। छोटी बहन समझ नहीं पा रही थी कि उसके साथ ऐसा क्यों हो रहा है।
उसने कई विद्वानों और ज्योतिषियों से इसका कारण पूछा। अंततः एक विद्वान ने उसे बताया कि वह पूर्णिमा का व्रत तो रखती है, लेकिन उसे अधूरे मन और नियमों के बिना करती है। व्रत का संकल्प लेने के बाद उसे श्रद्धा और विधिपूर्वक पूरा करना चाहिए। यह सुनकर छोटी बहन को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसे अपनी बड़ी बहन की बातें याद आने लगीं। उसने निश्चय किया कि अब वह पूर्णिमा का व्रत पूरे नियमों और सच्चे मन से करेगी।
बड़ी बहन के पुण्य से जीवित हुई संतान
कुछ समय बाद छोटी बहन के घर फिर एक बच्चे का जन्म हुआ। लेकिन इस बार भी उसकी मृत्यु हो गई। छोटी बहन का दुख असहनीय हो गया। उसने बच्चे के शरीर को एक साफ कपड़े से ढककर एक चौकी पर रख दिया। इसके बाद उसने अपनी बड़ी बहन को घर बुलाया। जब बड़ी बहन वहां पहुंची, तो छोटी बहन ने उससे बच्चे को गोद में लेने का आग्रह किया। बड़ी बहन जैसे ही बच्चे को उठाने के लिए आगे बढ़ी, उसके हाथ का स्पर्श होते ही बच्चा जीवित हो उठा और रोने लगा। यह देखकर छोटी बहन आश्चर्यचकित रह गई। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि जिस बच्चे को वह मृत समझ चुकी थी, वह फिर से जीवित हो गया।
बड़ी बहन ने छोटी बहन से कहा कि उसके स्पर्श से बच्चे को जीवन इसलिए नहीं मिला कि वह कोई चमत्कारी शक्ति रखती है, बल्कि लोकप्रचलित कथा में इसे उसके पूर्णिमा व्रत के पुण्य और ईश्वर की कृपा का फल बताया गया है। तब छोटी बहन को समझ आया कि बड़ी बहन के प्रति उसकी श्रद्धा और विश्वास के साथ-साथ व्रत को पूरे मन से करने का संदेश कितना महत्वपूर्ण है।
छोटी बहन ने लिया व्रत पूरा करने का संकल्प
इस घटना के बाद छोटी बहन ने प्रण लिया कि वह प्रत्येक पूर्णिमा को श्रद्धापूर्वक व्रत करेगी। उसने मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि वे उसके परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखें। उसने अपने जीवन में धार्मिक नियमों का पालन करना शुरू किया और दूसरों को भी व्रत का महत्व समझाने लगी। धीरे-धीरे यह कथा नगर में प्रसिद्ध हो गई। लोग पूर्णिमा के दिन इस कथा को सुनने लगे और मां लक्ष्मी से सुख, शांति तथा समृद्धि की प्रार्थना करने लगे।
इस कथा से मिलने वाली सीख: धार्मिक परंपराओं में व्रत का महत्व केवल उपवास करने में नहीं, बल्कि श्रद्धा, आत्मसंयम, सच्चे संकल्प और ईश्वर के प्रति विश्वास में माना गया है। यह कथा लोकपरंपरा में प्रचलित है और इसके अलग-अलग रूप भी मिलते हैं।
शरद पूर्णिमा की कोजागरी लक्ष्मी कथा: गरीब ब्राह्मण वलित की कहानी
प्राचीन काल में मगध देश में वलित नाम का एक ब्राह्मण रहता था। वह विद्वान, धर्मपरायण और सदाचारी था। उसे अनेक शास्त्रों का ज्ञान था। वह प्रतिदिन स्नान करता, संध्या-वंदन करता और धार्मिक नियमों का पालन करता था। इतना धार्मिक होने के बावजूद उसके जीवन में आर्थिक कठिनाइयां थीं। उसके पास धन-संपत्ति नहीं थी। वह किसी के सामने हाथ फैलाना पसंद नहीं करता था। जो कुछ मिल जाता, उसी में संतोष करके अपना जीवन व्यतीत करता था।
वलित की पत्नी का स्वभाव उससे अलग था। दोनों के विचारों में अक्सर मतभेद रहता था। एक दिन वलित को अपने पिता का श्राद्ध करना था, लेकिन उसके पास श्राद्ध के लिए पर्याप्त धन नहीं था। उसने अपनी पत्नी से कहा कि घर में अधिक पकवान न बनाए जाएं और साधारण तरीके से श्राद्ध का कार्य पूरा कर लिया जाए। लेकिन उसकी पत्नी ने उसकी बात का उलटा किया। उसने कई प्रकार के व्यंजन बनाए और नगर के योग्य ब्राह्मणों को आमंत्रित कर लिया। इस प्रकार श्राद्ध का कार्य संपन्न हुआ, लेकिन बाद में दोनों के बीच मतभेद और बढ़ गया। वलित दुखी होकर घर छोड़कर वन में चला गया। उसने निश्चय किया कि वह वन में रहकर तपस्या करेगा और मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने का प्रयास करेगा।
वलित की तपस्या और शरद पूर्णिमा का आगमन
वलित वन में नदी के किनारे रहने लगा। वह फल-मूल खाकर अपना जीवन बिताता और ईश्वर का स्मरण करता था। धीरे-धीरे कई दिन बीत गए। इसी वन में नागकन्याएं भी रहती थीं। वे मां लक्ष्मी की उपासना करती थीं। आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा का दिन निकट आया, जिसे आज शरद पूर्णिमा और कोजागरी पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। नागकन्याओं ने इस पावन अवसर पर मां लक्ष्मी की विशेष पूजा करने का निश्चय किया। उन्होंने अपने पूजा स्थल को सजाया, दीपक जलाए और विभिन्न पूजन सामग्रियों से मां महालक्ष्मी की आराधना की।
रात्रि के प्रथम प्रहर में पूजा करने के बाद वे पासे का खेल खेलने बैठीं। लेकिन खेल के लिए एक व्यक्ति की कमी थी। तभी उनकी दृष्टि नदी के किनारे बैठे वलित पर पड़ी। उन्होंने उसे अपने साथ खेलने के लिए बुलाया। वलित ने पहले मना कर दिया। उसका मानना था कि जुआ खेलने से धन और धर्म दोनों की हानि हो सकती है। तब नागकन्याओं ने उसे समझाया कि वे इस रात मां लक्ष्मी के व्रत और पूजन के अंतर्गत यह परंपरा निभा रही हैं। आखिरकार वलित उनके साथ चला गया। नागकन्याओं ने उसे प्रसाद और नारियल का जल दिया। इसके बाद खेल आरंभ हुआ।
आधी रात को मां लक्ष्मी ने दिया दर्शन
रात्रि बीतती गई और आधी रात का समय आ गया। उसी समय भगवान विष्णु के साथ मां लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण कर रही थीं। कोजागरी व्रत की मान्यता के अनुसार, मां लक्ष्मी इस रात जागने वाले भक्तों को देखती हैं और पूछती हैं— “को जागर्ति?” अर्थात, कौन जाग रहा है? इसी प्रश्न से कोजागरी नाम की व्युत्पत्ति जोड़ी जाती है। धार्मिक विश्वास है कि जो व्यक्ति इस रात श्रद्धापूर्वक जागरण करता है और मां लक्ष्मी की पूजा करता है, उस पर देवी की कृपा होती है।
भगवान विष्णु ने वलित को देखा। वह अत्यंत निर्धन था, लेकिन उस रात मां लक्ष्मी की पूजा में सम्मिलित हुआ था। भगवान विष्णु ने मां लक्ष्मी से कहा कि इस ब्राह्मण पर कृपा करें, ताकि उसके जीवन की दरिद्रता दूर हो सके। मां लक्ष्मी ने वलित पर अपनी कृपादृष्टि डाली। कथा के अनुसार, उनके आशीर्वाद से वलित का भाग्य बदल गया। उसे धन-संपत्ति और सुख प्राप्त हुआ। वलित का जीवन बदलने लगा। उसके पास समृद्धि के साधन आए और उसकी निर्धनता दूर हुई। वह मां लक्ष्मी की कृपा के प्रति कृतज्ञ हो गया।
इस कथा में आगे बताया जाता है कि नागकन्याओं के साथ उसका विवाह हुआ और वह उनके साथ अपने घर लौटा। अपने जीवन में आए परिवर्तन के बाद उसने अपनी पत्नी के साथ भी सम्मानपूर्ण व्यवहार करना शुरू किया। इस प्रकार वलित की कथा कोजागरी पूर्णिमा पर मां लक्ष्मी की आराधना, रात्रि जागरण और देवी की कृपा का महत्व बताती है। यह कथा व्रतराज नामक व्रत-संग्रह में सनत्कुमार संहिता के संदर्भ से मिलती है।
इस कथा से मिलने वाली सीख: मनुष्य को कठिन परिस्थितियों में भी धर्म, श्रद्धा और धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए। मां लक्ष्मी की उपासना के साथ सदाचार, परिश्रम और दूसरों के प्रति सम्मान को भी महत्व देना चाहिए।

